एक दिन की भुख
कुछ कहानियाँ काल्पनिक कुछ यथार्थ से भरे होतें है परन्तु लिखने का मकशद कंही न कंही कुछ सन्देश को आवाम तक पंहुचाने की ही होती है।ऐसे ही एक कहानी है कमला देवी की जिनके पति एम्बुलेंस ड्राइवर थे। जिनकी लगभग आधी जिंदगी मरीजों के संग गुजरी और एक दिन एक मरीज की जीवन सुरक्षित कर घर वापसी के दौरान सड़क दुर्घटना में उनकी जीवन लीला समाप्त हो गई। खुद तो स्वर्ग पा लिया शायद, परंतु इस संसार रुपी नरक में भोगने को अपनी पत्नी कमला और बारह वर्षीय पुत्री रेणु उर्फ़ छुटकी को छोड़ गए। एक-दो बार मिला था मै कमला दीदी से उसी वक्त जान पाया था की खुद तो खाली हाँथ गए ही घर भी ढंढनाता हुआ ही छोड़ गए। परन्तु यह जानकर आंनद विभोर हुआ था की कमला दीदी हार नहीं मानी और काम करने लगी थी।परन्तु समय की सुई घूमने से कंहा बाज आती है !
उसदिन रात के करीब सवा दो बज रहे थे। प्रायः मेरे लिखते-पढ़ते घडी का काँटा बारह के पार हो ही जाता है। अभी नींद रास्ते में ही थी कि गेट पर किसी स्त्री के द्वारा मेरे पत्नी को पुकारने की आवाज़ मेरे कानो तक पहुँचती है ,नींद आधी रास्ते से ही लौट गई। मैंने पत्नी को उठाया और मामले की जायजा लेने को भेजा,खुद ओढ़ने में ही घुसा रहा। करीब आधे घंटे के बाद श्रीमती जी मेरे पास आईं तो मैंने पुछा 'क्या बात है? कौन है?' श्रीमती जी ने कुछ नहीं कहा बस इशारा किया की स्वयं ही देख लूँ थोड़ा विस्मित जरूर हुआ इस अनसुलझे पहेली से पर, जाकर देखा तो कमला दीदी बैठी थीं,मुखमंडल तेज को तरसता हुआ,आँखे नम और ललाट पर चिंता की कुछ लकीरें लीये।
उस वक्त मैं तो क्या संसार का कोई भी व्यक्ति उनकों देखकर यह अनुमान लगा लेता की वें संकट में हैं।फिर भी मैंने पूछना ही उचित समझा-'कमला दीदी आप इतनी रात को क्या बात है'?कुछ पलों की ख़ामोशी के बाद उन्होंने कहा-'तुम तो जानते ही हो भैया की उनके जाने के बाद मैंने कभी किसी के आगे हाँथ नहीं फैलाया ,निःसंकोच पराये घरों में बर्तन-बासन कर छुटकी को पाला' "ये तो बड़ी अच्छी और सराहनीय बात है दीदी" मैंने बीच में ही अपनी भावना व्यक्त किया। 'परन्तु भैया आज के मेरे हालत इस सच्चाई से मुझे अवगत करा चुकें हैं की केवल अच्छी बातों से पेट नहीं भरता ' "मतलब " 'मतलब की आज तुम्हारे पास मैं मेरे द्वारा संजोये गये सारे समझौतों को गिरवी रखने आई हूँ' इतना कहकर वे बिलख-बिलख कर रोने लगतीं है।
उस वक्त मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे गंभीरता ने संसार के संपूर्ण घरों का त्याग कर मेरे घर में आश्रय कर लिया था। मैंने उनको शांत करते हुए आगे की कहानी जानने की इच्छा जाहिर तो उन्होंने बताया की दो महीने पूर्व बीमार रहने के दौरान उनकी नौकरी जाती रही। बहुत कोशिश की पर दूसरी नौकरी नहीं मिली और हालात ने उन्हें मेरे पास आने को मजबूर कर दिया। परन्तु इस प्रश्न के उत्तर से मैं अभी भी अनभिज्ञ था की तत्काल में वो मुझसे क्या चाहतीं हैं। मैंने अब इस उधेड़बुन को समाप्त करना ही उचित समझा। मैंने गंभीर होते हुए कहा-'बताएं कमला दीदी मैं किस प्रकार से आपकी सहायता कर सकता हूँ '? उन्होंने करुणा भरी शब्दों में कहा 'मैं यंहा रुपये पैसे मांगने नहीं आई न ही मुझे अपनी कोई चिंता है ,छुटकी कल सुबह से ही भूखी है ,मैंने बहुत कोशिश किया की उसे शांत कर सकूँ परन्तु उसकी भूखी आंसुओं ने मेरे सारे हिम्मत को तोड़ दिये-बस कुछ खाने को हो तो दे दो "जिस प्रकार उनके ये शब्द फूटे थे कोई पत्थर की मूर्ति भी अगर सुन ले तो उसके भी आंसू निकल आये मैं भला हाड़-मांस का इंसान ठहरा ,अपने आप को नहीं रोक पाया और कमला दीदी से अपने आंसू छुपाते हुए किचन में जो भी था उसको गरम करके उनको दिया और हिम्मत न हारने को कह विदा किया। विदाई तो हो गई इस एक दिन की भूख की परन्तु कल क्या होगा ?क्या कल की भूख झेल पाएंगी कमला दीदी या फिर वो कल की भूख उन्हें और उनकी बेटी को देहधंधा करने को मजबूर कर देगी या कि आत्मदाह। ये सारे प्रश्न मेरे भीतर घर कर चुके थे। परन्तु अब सब ठीक है उन्हें दुबारा काम मिल गया है,खुश हैं आज के जीवन से कमला दीदी । ये तो संभल गयी पर क्या सभी ऐसे परिस्थितियों को झेल पाते है यह प्रश्न आज भी मुझे परेशान करतें है।