Monday, 6 July 2015


जिन्दगी के अनुभव से …… 


निरांजली………… 

सत्रह वर्ष हो गए मेरे शादी को परन्तु आज सात वर्षो से मैं अपनी जिंदगी की गाड़ी अकेले ही हाँक रही हूँ। बीस की थी तभी पापा ने समीर के साथ विवाह बंधन में बाँध कर घर से दूर कर दिया था। फिर तीस की हुई तो समीर ने अपने जिंदगी से। अभी मैं अपने पापा के साथ अपने मायका में ही रहती हूँ। खुश हूँ और अब कोई मानसिक तनाव मुझे परेशां नहीं करते। पहले कुछ लोग पति से अलग रहने का कारण पूछते तो बता नहीं पाती थी।पर आज, सच सबके सामने है। 
                                                  शादी के बाद समीर मुझे कलकत्ता ले आया था। हमने दो साल की फैमिली प्लानिंग की और साथ में यह भी फैसला लिया की दो साल के बाद हममे से कोई बहाना भी  नहीं करेगा।समीर के साथ  बिताये हुये वो दो साल मैं कभी नहीं भूल सकती। ऐसा लगता था की समीर धरती की सारी खुशियों को इकट्ठा कर मेरी झोली में डालना चाहता हो। न शक न शर्त, न शिकायत न शिकवा वह दो साल हमने भरपूर जिया। पर क्या पता था की की बिताई हुयी वह खुशी, वो चिराग होगी जिसके निचे का अन्धकार मेरे आने वाले समय को अपने आगोश में लेकर; मेरे इस जीवन को ही अन्धकार का पर्याय बना देगी। 
दो साल बीत चुके थे। …  और एक रात मैंने ही समीर से कहा की मैं आपको अब एक सुन्दर बच्चे के पिता के रूप में देखना चाहतीं हूँ। मेरे इस चाहत को समीर का पूरा समर्थन मिला था। परन्तु कभी-कभी मैं अपने आप को कोसती हूँ  कि काश मैंने उस वक्त अपने अरमां को काबू में रखा होता तो खुशियों से भरे कुछ और पल, मेरे भीतर अपना बसेरा बसाये होते। दो साल और बीत चुके थे। लेकिन एक बच्चे की हमारी लालसा, अभी स्वप्न भर ही थे। एक दिन समीर कुछ उदास सा दिखा। मुझे कारण समझते देर न लगी। मैंने समीर को समझाया कि ''किसी -किसी के साथ देर सबेर हो जाती है।  हो सकता है मैं भी उन्ही में से एक होऊं। उदास होने से क्या होगा, कोशिश तो कर ही रहें है न हम दोनों।' 'ज्यादा चिंता मत किया करो देर होगा दुरुस्त होगा।' समीर को शायद मेरी बातों से कुछ शांति मिली उसने हामी भरी और बेडरूम में चला गया।         
  इन चार सालो में ऐसा पहली बार हुआ था की समीर ने उसदिन  भरमन मुझसे बात नहीं किया।दुसरे दिन समीर ऑफिस से जल्दी आ गये और मुझसे कहा की- निरा आज हम दोनों बाहर जाने वाले हैं, तुम जल्दी से तैयार हो जाओ।मैंने सुना और  मुझमे जैसे पंख लग गये,मैं फुदकने लगी थी नवजात पक्षियों के जैसे और ख़याली पुलाव पकने लगे थे मन में। पर कुछ समय के बाद रेडी होकर निचे गयी तब पंख और पुलाव दोनों ख़ाक हो गए जब उन्होंने बताया की डॉक्टर के पास जा रहें हैं।  मैंने पुछा कि हम डॉक्टर के पास क्यों जा रहें हैं तो चिढ़ते हुए कहा की अब मैं इस भूल-भुलैया को ख़त्म कर देना चाहता हूँ। समीर को इतना बेचैन ,परेशान मैं पहली बार देख रही थी। मैंने कोई बहस किये बिना  साथ जाना ही उचित समझा क्योंकि बिना कारण ,बिना प्रमाण की बहस किसी भी रिस्ते को चकनाचूर करने के लिए  काफी होतें है और ऐसा मैं हरगिज नहीं चाहती। हम दोनों ने अपनी जाँच करायी और घर आगये। दो दिन बाद समीर रिपोर्ट लेकर आया और सीधे मेरे चेहरे पर दे मारा। इस प्रकार के व्यवहार से कुछ देर बुत बने मैं समीर को निहारती रही और फिर आँसू पोछकर रिपोर्ट पड़ने लगी। कमी मुझमे ही थी। रिपोर्ट में साफ़-साफ यह लिखा था की मैं कभी किसी बच्चे को जन्म नहीं दे सकती। उस वक्त मुझपर क्या बीत रही थी मैं बयां नहीं कर सकती। बस मुझे सहारे की जरुरत थी जो मुझे समीर ही दे सकता था। मैं भागकर गयी और समीर से लिपट कर रोने लगी। पर समीर मुझे अपने से अलग कर बैडरूम में चला गया। इस घटना ने मुझे भीतर तक झझोर दिया। मैं बिलख पड़ी पर समीर नहीं आया मेरी आंसू पोछने।मुझमे भय व्याप्त होने लगा था की समीर की ये बेरूखी ,हमारे रिस्तों में कंही दरार न कर दे।इसलिए मैं खुद ही समीर के पास गई। उस वक्त मैंने उसे बहुत समझाया कि -क्या हुआ जो  मैं किसी बच्चे को जन्म नहीं दे सकती हूँ, माँ तो बन ही सकती हूँ और तुम पिता। हम किसी अनाथ को अपना लेंगे। उन्हें भी तो माँ -बाप चाहिए ही न जैसे हमें बच्चा। पर समीर खामोश सुनता रहा।            
                       समीर की ख़ामोशी सालो तक जारी रही। फिर धीरे-धीरे हमारे बीच झड़प बढ़ने लगी। उस समय मैंने लाखों बार ये प्रयास किया की हमदोनो के बीच की दरार अपने प्रेम से भर दूँ पर असफल रही। हमारे बीच दूरियां बढ़ने लगी थी.…।  और एक दिन समीर ने साफ-साफ कह दिया की वो दूसरी शादी करना चाहता है। मुझे अपने साथ नहीं रखना चाहता है। मैं कई दिनों तक रोती रही,तड़पती रही पर समीर पर जैसे दूसरी शादी का भुत सवार था। … और आखिर, एक दिन समीर ने मेरी सौत को लाकर मेरे सामने खड़ा कर दिया। फिर उसने मुझसे कहा कि 'निरा आओ ,देखो ये है अंजलि है न सुन्दर।उसके बेशर्मी से भरे वो शब्द हज़ारो कांटे बनकर मुझे चुभे।मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या ये वही समीर है जो मुझपर चाँद ,तारे निछावर करने की बातें किया करता था। उस वखत मैं ये सोचने पर मजबूर हो गयी थी की इस परिस्थिति के लिए मैं किसे दोसी ठहराऊँ, अपनी किस्मत को की पापा के द्वारा हड़बड़ी में लिए उस फैसले को।फिर सोचा की पापा की इसमें क्या गलती है। गलती तो भगवान की है ,इनसानों में सारी क़ाबलियत भरी उन्होंने , बस मन और दिल कोई पढ़ पाये ऐसा तकनीक डालना भूल गए वरना आज मुझे ये दिन, न देखना पड़ता।फिर दुसरे ही दिन समीर ने मुझसे पेपर पर सिग्नेचर लेकर घर से जाने को कह दिया। उस वक्त मेरे पास दो रास्ते थे।पहला , या तो मैं अपने अधिकारों के लिए लड़ती या चुपचाप वंहा से चली जाती। मैंने दूसरा वाला रास्ता चुना क्योंकि जब पति पर ही अधिकार न रहा तो उसके रुपये पैसे लेकर एक स्त्री कौन सा सपनो का महल खड़ा कर लेगी। समीर से अलग होते समय मेरे मन में एक विचार जन्म ले रही थी कि -क्या ? विवाह बिस्तर बच्चे का ही दूसरा नाम है। क्या ? वो विस्वास ,वो प्रेम का बंधन और आपसी समझौते स्त्री में उत्पन्न एक छोटी सी कमी के आगे और छोटे हो जातें है। 'बहरहाल कुछ भी हो पर मेरे कोख से बच्चा न होना हमारे अलगाव का कारण नहीं था'              
                                                               मेरी यह भ्रम उस वक्त टूटी जब उनसे अलग हुए पांच साल हो गए थे। उस दिन दोपहर का समय था। मै पापा के लिए लंच बना रही थी। तभी डोरबेल बजा। पापा ने दरवाजा खोला तो सामने एक लड़की रोती ,बिलखती मुझे ढूंढ रही थी। पापा ने मुझे बुलाया। मैं आई और देखा तो उसका चेहरा मुझे जाना पहचाना सा प्रतीत हो रहा था। फिर ध्यान आया की ये तो अंजली है। मैंने उसे बिठा कर,शांत कराते हुए पानी का ग्लास बढ़ाया,फिर चाय बनायीं और फिर उसकी आपबीती सुनी।उसने बताया की वो भी कभी माँ नहीं बन सकती इसलिए समीर ने उसे भी छोड़ दिया। मैंने उसके रिपोर्ट देखे उसमे भी वही बाते लिखी थी। पता नहीं क्यों और कहाँ से आया पर मुझे कुछ डाऊट सा हुआ। फिर मै ने दुसरे क्लिनिक में अपनी और अंजली की जांच करायी। … और जब रिपोर्ट आई तो सारा खेल साफ़ हो गया। मुझमे सच में कमी थी परन्तु अंजलि में ऐसी कोई कमी नहीं थी। समीर ने वो रिपोर्ट फर्जी बनवाया था, डॉक्टर को पैसे देकर। चूँकि मरे साथ तो उसे बहाना मिल गया था पर अंजली को अलग करने का उसके पास कोई बहाना नहीं था। इसलिए उसने ये नाटक रचाया था।फिर हमने पुलिस में कम्प्लेन किया। डॉक्टर तो पकड़ा गया पर समीर की तलाश अभी भी जारी है। आज समीर जैसों पर मुझे तरस आती है। फिर भी अगर समीर ने मुझे अपनाते हुये ,बच्चे के खातिर दूसरी शादी करना चाहता तो शायद मैं मान भी जाती। हाँ ,ये सच है की थोड़ा दुख होता पर ये भी सच है की आपसी समझौते ही रिस्तों को बचाने का एकमात्र विकल्प हैं। काश उसने मुझसे समझौता किया होता। काश ,उसने कहा होता कि निरा और अंजली दोनों मेरे दिल के टुकड़े हैं। पर वो क्यों कहता ? उसे तो शरीर की भूख थी बच्चे की नहीं।   






‪#‎सर्वाधिकार‬ सुरक्षित 


                                                             अजय मिश्र 'धुनी'   
                

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