Wednesday, 1 July 2015


जिन्दगी एक पहेली आसां नहीं सुलझाना
रुकना नहीं तू हार के राही  रे चलते जाना।

उसदिन कलकता ले जाने के लिए एम्बुलैंस में सुलाते समय पिता जी के आँखों से फूटते अश्रुधारा के बून्द-बून्द,परिवार से बिछड़ने का उनका गम और उनके गुजर जाने के बाद परिवार की चिंता के बोल बने से थे,जिसे मैं साफ़-साफ सुन पा रहा था।परन्तु उनके आँखों में आंसू मुझे पहली बार दिखे थे। अपने पुरे जीवन काल में पिताजी ने हमारे समक्ष ,अपनी संवेदनाओं को कभी भी जाहिर नहीं होने दिया था। हमेशा कठोर हृदय के बने रहे।ऐसा नहीं था की आमदनी कम थी। बस मुट्ठी बंद करने की आदत सी बन गयी थी। उनकी इस आदत ने माँ को चिड़चिड़ा बना दिया था और माँ के इसी स्वभाव ने इन दोनों के बीच दूरिया पैदा कर दी थी।

इनके वैवाहिक जीवन के चंद दिन ही बिना घमासान के गुजरे होंगे,शायद !
वरना मेरे होश आने के बाद से, मैंने इनके बीच निरंतर तुतु-मैमै होते ही देखा है।जब भी माँ अपनी आपा खो देती, उसके पास पिताजी को सुनाने की लिए बस एक ही नारा होता और वो ये कि जब परिवार का वर्तमान ही अन्धकार में होगा तो वे हमारे लिए ,भविष्य के किस रौशनी की तलाश में बचत कर रहें हैं।पर उसदिन का मंजर बिलकुल भिन्न था ,दोनों एक दूसरे के लिए आंसू बहा रहे थे। माँ इतनी बेचैन थी की उनके कदम अस्थिर हो गए थे ,भागकर कभी पिताजी को निहारती तो कभी मेरे पास आकर फफक पड़ती और मैं बार-बार उन्हें यही सांत्वना देता की की वे घबराएं नहीं सब ठिक हो जायेगा।मेरे वे निश्चिंतता भरे जवाब ,कभी-कभी उनके भीतर संदेह पैदा कर देता और वें मेरी तरफ आश्चर्य भरे निगांहो से ताकतीं।पर मैं उन्हें कैसे समझाता कि उनकी वें आपसी घमासान और नफरत भरी उन पलों ने मुझे इतना कठोर बना दिया था की अब किसी भी प्रकार के हादसे मुझे पिघला नहीं सकते थे और वख्त का तकाजा भी यही था की मैं कठोर ही बना रहूँ।
                         उस वखत मेरा हृदय पिघलता भी तो उसका कारण पिताजी की बीमारी नहीं अपितु उन दोनों के भीतर बढ़ता ,वो आपसी प्रेम होता जिसे मैंने पहले कभी महसूस नहीं किया था।उनके बहते संवेदनाऐं मेरे भीतर एक अमिट आत्मविस्वास को जन्म दे चुकी थी और मैं ठान चूका था की अब चाहे जो करना पड़े मैं उनके इस प्रेम को किसी भी हाल में मिटने नहीं दूंगा। मैंने माँ से वादा तो कर दिया था की पिताजी को वापस जिन्दा लेकर आऊंगा, पर कैसे ? मैं तो बेरोजगारी से जूझ रहा था! हाँ ,पिताजी लेकर आये थे चार सौ रुपये ! अपने हार्ट के ऑपरेशन के लिए ? उनके इस करनी से तभी मुझे ज्ञात हुआ था की कोई भी गार्जियन सच में अपने लिए रुपये नहीं कमाते अपितु परिवार के लिए ही कमाते है।
                                             उसदिन मैंने पिताजी के बक्से का कोना-कोना-छान दिया था पर उनके रखे रुपये मेरे हाँथ नहीं लगे और रही बैंक की बात,पिताजी ने कभी बैंक का शक्ल ही नहीं देखा था। उन्हें बैंक से ज्यादा अपने बक्से पे भरोसा थी।इसका कारन पूछने पर कहते कि रुपये पास में रहता है तो उन्हें संतोस रहता है।कभी-कभी इनके अबोधपने पर हम सबकी हंसी निकल जाती थी।उसदिन माँ ने पुछा भी की रुपये कहाँ रखें है पर उन्होंने नहीं बताया शायद इसलिए की उन्हें अपने जीवित वापस लौटने पर संदेह हो चूका था।पर ऐसा नहीं हुआ वो लौटे ,समाज में मेरी मौजूदगी ने अपना रंग दिखाया और समाज के मदद से पिताजी को दुबारा अपने परिवार में साथ समय बिताने का मौका मिला।उनके आने के बाद मैं अपने आप को आज़ादी के पूर्व जन्मा एक इंसान के रूप में देखने लगा था। जिसका एकमात्र स्वप्न यही था की आज़ादी के बाद उसे सुख ,शांति पुर्वक जीवन व्यतीत करने का अवसर प्राप्त होगा। पर सारे ख्वाब अधूरे ही रह गए।दोनों (माँ-पिताजी ) अपने वास्विक प्रकृति में वापस आ चुके थे।फिर से घमासान छिड़ने लगा था और मैं समझ गया की उनकी उस वक्त वाली संवेदना समय की मांग भर थी जिसे उन्होने बखूबी निभाया था।डिमांड पुरी होते ही अब भाव वही थे जो पिताजी के अस्वस्थता के पहले थे।

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