प्यास देखने की उसे जो अब इस दुनिया में नहीं.......
खुली पलकों से ना सही
निगाहे बंद ही सही.........
नाचीज़ की खता नहीं
रंगो का है कुसूर
वक़्त के रंग फ़िके
के उभरते नहीं कहीं
खुली पलकों से न सही
निगाहें बंद ही सही
नियाज़मंद हूँ दिख जाय
तसववुर में तू कहीं
सुरूर नूर के दीदार को
सरमस्त हो रहा
नहीं मौज़ूद तू तो क्या
तेरी एहसास ही सही
आँकू नज़रों से चाहूँ
तेरी तस्वीर बना दूँ
पर छूलूं जिस्म को तेरे
नापाक सख्स मैं नहीं
मैं तो चितेरा हूँ तसववुर से
जो है चित्र आँकता
सूरत नहीं उभरी तो क्या
तेरी अक़्स ही सही ।
#सर्वाधिकार सुरक्षित
अजय मिश्र 'धुनी'

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