Monday, 6 July 2015

एक पहल बेटियों के अधिकार के लीये ....... 

इबनत 

अब रीत नया एक 
रिवाजी कर लो 
के इबनत को जुर्रियत 
में शामिल कर लो 

गुदड़ी हुए पुराने 
वो नक़ाब देख़ो 
लो पहलु में इन्हे,अब
तो नज़रिया बदलो 

न समझो दिन, निगल
जाती वो रात इन्हे
ये तो माहताब हैं,घर
अपना रोशन कर लो 

तबस्सुम जो थे आ-
जाया करते देख इन्हे 
पिनहां हुये चेहरों पे 
हाज़िर कर लो 

अब जहन्नुम है हुये 
देख हाल इस गुल के
जा दरगाह पै, इनके 
लिए मन्नत कर लो 

ये तो मुर्सिला पैगंबर
की, हिज़ाब घर की 
बहरायाब हुये तुम- के
कुछ सवाब कर लो

है ये इब्न का ईक 
इब्तिदा दाख़िलकर लो 
 के इबनत को जुर्रियत
 में शामिल कर लो। 




‪#‎सर्वाधिकार‬ सुरक्षित 


अजय मिश्र 'धुनी' 

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