Monday, 6 July 2015



तुर्बत-ए-ग़ुलाब 



ग़ुबार,गर्की में गरीक
ग़ुरुब होते ख़त का 
अलक़ाब हूँ 
ग़ौर फ़रमायें ग़ौर से सितमगर 
गुज़रती हुयी हसीं 
ख़्वाब हूँ, 
फ़स्ल-ए-ख़िज़ा में ज़ालिम 
पामाल सी मैं ग़ुल
तमाजत में जलती ग़ालिब(प्रायः )
ग़मज़दा ग़मज़ा 
ग़ुलाब हूँ। 

बंद राज़ पढ़ ले ,ना 
इंसान के बस का 
हस्त हज़ार साल की  
हजरे मकान हूँ 
शब्द मेरे पाक़ मैं 
पयाम ख़ुदा की 
जो पढ़ न पाया इनसाँ 
वो अबवाब हूँ। 
मैं ग़मज़दा ग़मज़ा 
ग़ुलाब हूँ।।

आबाद थी मैं ग़ुल उस 
आबाई फ़िज़ा में 
आबादियों के बिच मैं 
आख़ोर बनी  हूँ
जड़ से उखाड़ी गयी कब 
मुतवल्लिद मारी गयी 
इनतिख़ाब नहीं उसका 
वो इन्बसा  हूँ। 
मैं ग़मज़दा ग़मज़ा 
ग़ुलाब हूँ।।

आज़ार हुयी बार-बार 
अतारों के हाँथो 
दफ़नायी गयी मैं फ़िर 
अतर बनी  हूँ 
अजसाम मेरे अब्तर 
आख़ोर हो गये 
गंधहीन ख़ाक हुई  
वो तुराब हूँ। 
मैं ग़मज़दा ग़मज़ा 
ग़ुलाब हूँ।।

आशियाना था मेरा कभी 
इलाह तेरा बैतुतसनम
कसफो की आज 
ख़ाक-पा बनी  हूँ
आह-आह-का शोर जो 
गूंजा है अफ़रात 
एहजान का जो हद है 
मैं वो ताब हूँ। 
मैं ग़मज़दा ग़मज़ा 
ग़ुलाब हूँ।।

नायाब थी कभी मैं 
शादाब   थी   कभी 
ख़राबात की अब मैं 
बादाए नाब बनी  हूँ 
आदाब है ज़नाब 
मेरे तसर्रुफ़ के बद इवज़ 
हिज़ाब से बेहिजाब किया,
वो नक़ाब हूँ। 
मैं ग़मज़दा ग़मज़ा 
ग़ुलाब हूँ।।  
  
इत्र मैं आब मैं 
रस भी शमीम भी 
पर आज शवों पे 
उबसती संग हूँ 
क़ब्र में लेटा जो 
तन्हा परिन्दा है 
उसके ख़लवत का 
बनी असहाब हूँ। 
मैं ग़मज़दा ग़मज़ा 
ग़ुलाब हूँ।।

ग़ुल मैं जो थी कभी 
ख़ुशहाल गुलस्तां में 
क़ब्र में ख़ामोश अब 
फ़क़ीर बनी  हूँ 
शोर-गूल से मुर्दे  
रूठ जाते हैं अक़्सर
तबस्सुम की उनकी 
मैं असबाब हूँ। 
मैं ग़मज़दा ग़मज़ा 
ग़ुलाब हूँ।।

गुलचीं की ख़िदमत औ 
गुलज़ार थी गुलस्तां 
आज़ सर-ए-आम मैं 
बाज़ार बनी  हूँ 
हैवानियत का मंज़र 
दलालों का मज़मा है 
औ,ग़ुल मैं बनी 
उनकी इक़तिसाब हूँ।  
मैं ग़मज़दा ग़मज़ा 
ग़ुलाब हूँ।।

उल्फ़तों में थी कभी 
पयाम बनी मै,
अब शाकिस्ता दिल की 
ख़ाकदान बनी हूँ 
सआदत था,थी कभी
इक्लील ख़ुदा की 
बिस्तरों की आज बनी 
मैं रिकाब हूँ।  
मैं ग़मज़दा ग़मज़ा 
ग़ुलाब हूँ।।

बुलंद थी आवाज़ जो 
तवारीख़ में अब बंद मै,
हक़ाइक़-आश्नो कि ग़ुम 
हुयी,आवाज़ बनी हूँ
उम्मीदों के बाग़ में, 
जो हिर्मान अफ़रात,
उस हिर्मानसीब तहय्युर की 
दास्ताँ बनी  हूँ 
क़ुर्बा हुये कसफो ने 
बोया जो बिज़ था 
जमहूर में सुस्त अब 
वो इन्क़िलाब हूँ। 
मैं ग़मज़दा ग़मज़ा 
ग़ुलाब हूँ।।

मस्न हूँ मांद हूँ 
महरूम हुयी साज़ हूँ 
नूरेचश्म से मलऊन ,
मबहुत हुयी लाज़ हूँ ,
दिख रहा मुझे वो 
राह-ए-दहर का मंज़र 
के ख़लवत में इनसाँ 
की  आँसू  बनी   हूँ,
मुगायरत  मुहीत  है 
दुनियाँ  में  अफ़रात 
मज़लूम    वालदैन 
की  लबोलवाब  हूँ। 
मैं ग़मज़दा ग़मज़ा 
ग़ुलाब हूँ।। 

क़ौमियत में दर्ज़ हुयी 
फ़ख्र मैं उस क़ौम की 
फ़िर क़ौम-क़ौम खेल 
में   सैद   हुयी     हूँ,
कुतरे  हो  पंख   गये  
कुतरन हो चुन   रही  
वैसा  ही  मैं     ग़ुल 
बकनूस   बनी     हूँ, 
आतिश-जने  बेफ़िक्र 
निर्दोष   सज़ायाफ्ता 
सिक्कों के बिस्तर पे 
सोयी  एहतिसाब  हूँ।  
मैं ग़मज़दा ग़मज़ा 
ग़ुलाब हूँ।।

ख़ुद की ताबिश  औ 
आफ़ताब जैसे जलता  
देख़ ग़ुल की हालत 
वो  भी  पिघलता , 
तवह्हुश में हूँ ख़ुदा 
आसारे हश्र से, गर 
यूँ लुटती रही, क़ब्र
यूँही   बढ़ता   रहा,
मैं रूह तुम्हारी हूँ 
ज़ख़्मी न करो 
दर्द फ़िर होगा तुम्हे 
वो इनतिसाब हूँ। 
मैं ग़मज़दा ग़मज़ा 
ग़ुलाब हूँ।।

जब कभी ख़याल-ए-
ऐश-ए-रफ़ता आती है 
पंखुरियों पे पड़ी ओस 
आँसू  बन जाती  है 
के  थी  मई  कभी 
सेहरा किसी की,अब 
मुतवफ़्फ़ी तश्वीरों की 
बनी  ख़िताब  हूँ। 
मैं ग़मज़दा ग़मज़ा 
ग़ुलाब हूँ।।  
  




‪#‎सर्वाधिकार‬ सुरक्षित 


अजय मिश्र 'धुनी' 

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