Monday, 20 July 2015

भाषा :एक आज़ाद परिंदा....

तो क्या गर मैं हिन्दू हूँ
उर्दु में लिखता गाता हूँ
इसपार कभी उसपार कभी
हूँ पंक्षी जो उड़ जाता हूँ
सरहद है क्या भाषाओँ की
सुर ताल गर बन जाता हूँ

तो क्या गर मैं हिन्दू हूँ
उर्दु में लिखता गता हूँ
भाषाएँ ही वो अमृत जो
प्राण न हरते रिस्तों के
है धर्म मेरा मानव हूँ मैं
मानवता का मैं नाता हूँ
तो क्या गर मैं हिन्दू हूँ
उर्दु में लिखता गाता हूँ
समझ है मुझमें खुब समझता
खिलाफ-ए -मसलेहत को
पर, ख़त्म न यूं होने दूंगा
भीतर ही भीतर हसरत को
भाषा ही बस अब जीवन है
इनसे ही सब मैं पाता हूँ

तो क्या गर मैं हिन्दू हूँ
उर्दु में लिखता गाता हूँ
है तन ये मानव मिट्टी का
मिट्टी का होके जाना है
आने वाले गाते जाएँ
वो कविता रचता जाता हूँ

तो क्या गर मैं हिन्दू हूँ
उर्दु में लिखता गाता हूँ।



#सर्वाधिकार सुरक्षित 
अजय मिश्र 'धुनी '

No comments:

Post a Comment