Monday, 20 July 2015

भाषा :एक आज़ाद परिंदा....

तो क्या गर मैं हिन्दू हूँ
उर्दु में लिखता गाता हूँ
इसपार कभी उसपार कभी
हूँ पंक्षी जो उड़ जाता हूँ
सरहद है क्या भाषाओँ की
सुर ताल गर बन जाता हूँ

तो क्या गर मैं हिन्दू हूँ
उर्दु में लिखता गता हूँ
भाषाएँ ही वो अमृत जो
प्राण न हरते रिस्तों के
है धर्म मेरा मानव हूँ मैं
मानवता का मैं नाता हूँ
तो क्या गर मैं हिन्दू हूँ
उर्दु में लिखता गाता हूँ
समझ है मुझमें खुब समझता
खिलाफ-ए -मसलेहत को
पर, ख़त्म न यूं होने दूंगा
भीतर ही भीतर हसरत को
भाषा ही बस अब जीवन है
इनसे ही सब मैं पाता हूँ

तो क्या गर मैं हिन्दू हूँ
उर्दु में लिखता गाता हूँ
है तन ये मानव मिट्टी का
मिट्टी का होके जाना है
आने वाले गाते जाएँ
वो कविता रचता जाता हूँ

तो क्या गर मैं हिन्दू हूँ
उर्दु में लिखता गाता हूँ।



#सर्वाधिकार सुरक्षित 
अजय मिश्र 'धुनी '


एक दिन की भुख


कुछ कहानियाँ काल्पनिक कुछ यथार्थ से भरे होतें है परन्तु लिखने का मकशद कंही न कंही कुछ सन्देश को आवाम तक पंहुचाने की ही होती है।ऐसे ही एक कहानी है कमला देवी की जिनके पति एम्बुलेंस ड्राइवर थे। जिनकी लगभग आधी जिंदगी मरीजों के संग गुजरी और एक दिन एक मरीज की जीवन सुरक्षित कर घर वापसी के दौरान सड़क दुर्घटना में उनकी जीवन लीला समाप्त हो गई। खुद तो स्वर्ग पा लिया शायद, परंतु इस संसार रुपी नरक में भोगने को अपनी पत्नी कमला और बारह वर्षीय पुत्री रेणु उर्फ़ छुटकी को छोड़ गए। एक-दो बार मिला था मै कमला दीदी से उसी वक्त जान पाया था की खुद तो खाली हाँथ गए ही घर भी ढंढनाता हुआ ही छोड़ गए। परन्तु यह जानकर आंनद विभोर हुआ था की कमला दीदी हार नहीं मानी और काम करने लगी थी।परन्तु समय की सुई घूमने से कंहा बाज आती है !
उसदिन रात के करीब सवा दो बज रहे थे। प्रायः मेरे लिखते-पढ़ते घडी का काँटा बारह के पार हो ही जाता है। अभी नींद रास्ते में ही थी कि गेट पर किसी स्त्री के द्वारा मेरे पत्नी को पुकारने की आवाज़ मेरे कानो तक पहुँचती है ,नींद आधी रास्ते से ही लौट गई। मैंने पत्नी को उठाया और मामले की जायजा लेने को भेजा,खुद ओढ़ने में ही घुसा रहा। करीब आधे घंटे के बाद श्रीमती जी मेरे पास आईं तो मैंने पुछा 'क्या बात है? कौन है?' श्रीमती जी ने कुछ नहीं कहा बस इशारा किया की स्वयं ही देख लूँ थोड़ा विस्मित जरूर हुआ इस अनसुलझे पहेली से पर, जाकर देखा तो कमला दीदी बैठी थीं,मुखमंडल तेज को तरसता हुआ,आँखे नम और ललाट पर चिंता की कुछ लकीरें लीये। 
उस वक्त मैं तो क्या संसार का कोई भी व्यक्ति उनकों देखकर यह अनुमान लगा लेता की वें संकट में हैं।फिर भी मैंने पूछना ही उचित समझा-'कमला दीदी आप इतनी रात को क्या बात है'?कुछ पलों की ख़ामोशी के बाद उन्होंने कहा-'तुम तो जानते ही हो भैया की उनके जाने के बाद मैंने कभी किसी के आगे हाँथ नहीं फैलाया ,निःसंकोच पराये घरों में बर्तन-बासन कर छुटकी को पाला' "ये तो बड़ी अच्छी और सराहनीय बात है दीदी" मैंने बीच में ही अपनी भावना व्यक्त किया। 'परन्तु भैया आज के मेरे हालत इस सच्चाई से मुझे अवगत करा चुकें हैं की केवल अच्छी बातों से पेट नहीं भरता ' "मतलब " 'मतलब की आज तुम्हारे पास मैं मेरे द्वारा संजोये गये सारे समझौतों को गिरवी रखने आई हूँ' इतना कहकर वे बिलख-बिलख कर रोने लगतीं है।
उस वक्त मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे गंभीरता ने संसार के संपूर्ण घरों का त्याग कर मेरे घर में आश्रय कर लिया था। मैंने उनको शांत करते हुए आगे की कहानी जानने की इच्छा जाहिर तो उन्होंने बताया की दो महीने पूर्व बीमार रहने के दौरान उनकी नौकरी जाती रही। बहुत कोशिश की पर दूसरी नौकरी नहीं मिली और हालात ने उन्हें मेरे पास आने को मजबूर कर दिया। परन्तु इस प्रश्न के उत्तर से मैं अभी भी अनभिज्ञ था की तत्काल में वो मुझसे क्या चाहतीं हैं। मैंने अब इस उधेड़बुन को समाप्त करना ही उचित समझा। मैंने गंभीर होते हुए कहा-'बताएं कमला दीदी मैं किस प्रकार से आपकी सहायता कर सकता हूँ '? उन्होंने करुणा भरी शब्दों में कहा 'मैं यंहा रुपये पैसे मांगने नहीं आई न ही मुझे अपनी कोई चिंता है ,छुटकी कल सुबह से ही भूखी है ,मैंने बहुत कोशिश किया की उसे शांत कर सकूँ परन्तु उसकी भूखी आंसुओं ने मेरे सारे हिम्मत को तोड़ दिये-बस कुछ खाने को हो तो दे दो "जिस प्रकार उनके ये शब्द फूटे थे कोई पत्थर की मूर्ति भी अगर सुन ले तो उसके भी आंसू निकल आये मैं भला हाड़-मांस का इंसान ठहरा ,अपने आप को नहीं रोक पाया और कमला दीदी से अपने आंसू छुपाते हुए किचन में जो भी था उसको गरम करके उनको दिया और हिम्मत न हारने को कह विदा किया। विदाई तो हो गई इस एक दिन की भूख की परन्तु कल क्या होगा ?क्या कल की भूख झेल पाएंगी कमला दीदी या फिर वो कल की भूख उन्हें और उनकी बेटी को देहधंधा करने को मजबूर कर देगी या कि आत्मदाह। ये सारे प्रश्न मेरे भीतर घर कर चुके थे। परन्तु अब सब ठीक है उन्हें दुबारा काम मिल गया है,खुश हैं आज के जीवन से कमला दीदी । ये तो संभल गयी पर क्या सभी ऐसे परिस्थितियों को झेल पाते है यह प्रश्न आज भी मुझे परेशान करतें है।
तरक्की …


एक गांव
जहाँ थी मिला करती
नरम मुलायम मिट्टी



बने मकान जिससे
थे हुआ करते
चिकने-चुपड़े सोंध-सौगंधित 



रहा करते थे जिसमे 
सीधे सरल इंसान 
सभी आनंदित 

शहर हो गया :



हो गए मकान सारे 
पत्थर के 

और इंसान 

पत्थर-दिल 
अमर्यादित । 




‪#‎सर्वाधिकार‬ सुरक्षित 

अजय मिश्र 'धुनी' 

Monday, 6 July 2015

कविमन :             उस लम्हें ने दिल को         आतिशखाना स...

कविमन :             उस लम्हें ने दिल को         आतिशखाना स...:             उस लम्हें ने दिल को          आतिशखाना सा कर दिया ……। जिन्हें खुशियों की गठरी बनाएं हमने थे  उन्हीं लम्हों ने मुझको...


तुर्बत-ए-ग़ुलाब 



ग़ुबार,गर्की में गरीक
ग़ुरुब होते ख़त का 
अलक़ाब हूँ 
ग़ौर फ़रमायें ग़ौर से सितमगर 
गुज़रती हुयी हसीं 
ख़्वाब हूँ, 
फ़स्ल-ए-ख़िज़ा में ज़ालिम 
पामाल सी मैं ग़ुल
तमाजत में जलती ग़ालिब(प्रायः )
ग़मज़दा ग़मज़ा 
ग़ुलाब हूँ। 

बंद राज़ पढ़ ले ,ना 
इंसान के बस का 
हस्त हज़ार साल की  
हजरे मकान हूँ 
शब्द मेरे पाक़ मैं 
पयाम ख़ुदा की 
जो पढ़ न पाया इनसाँ 
वो अबवाब हूँ। 
मैं ग़मज़दा ग़मज़ा 
ग़ुलाब हूँ।।

आबाद थी मैं ग़ुल उस 
आबाई फ़िज़ा में 
आबादियों के बिच मैं 
आख़ोर बनी  हूँ
जड़ से उखाड़ी गयी कब 
मुतवल्लिद मारी गयी 
इनतिख़ाब नहीं उसका 
वो इन्बसा  हूँ। 
मैं ग़मज़दा ग़मज़ा 
ग़ुलाब हूँ।।

आज़ार हुयी बार-बार 
अतारों के हाँथो 
दफ़नायी गयी मैं फ़िर 
अतर बनी  हूँ 
अजसाम मेरे अब्तर 
आख़ोर हो गये 
गंधहीन ख़ाक हुई  
वो तुराब हूँ। 
मैं ग़मज़दा ग़मज़ा 
ग़ुलाब हूँ।।

आशियाना था मेरा कभी 
इलाह तेरा बैतुतसनम
कसफो की आज 
ख़ाक-पा बनी  हूँ
आह-आह-का शोर जो 
गूंजा है अफ़रात 
एहजान का जो हद है 
मैं वो ताब हूँ। 
मैं ग़मज़दा ग़मज़ा 
ग़ुलाब हूँ।।

नायाब थी कभी मैं 
शादाब   थी   कभी 
ख़राबात की अब मैं 
बादाए नाब बनी  हूँ 
आदाब है ज़नाब 
मेरे तसर्रुफ़ के बद इवज़ 
हिज़ाब से बेहिजाब किया,
वो नक़ाब हूँ। 
मैं ग़मज़दा ग़मज़ा 
ग़ुलाब हूँ।।  
  
इत्र मैं आब मैं 
रस भी शमीम भी 
पर आज शवों पे 
उबसती संग हूँ 
क़ब्र में लेटा जो 
तन्हा परिन्दा है 
उसके ख़लवत का 
बनी असहाब हूँ। 
मैं ग़मज़दा ग़मज़ा 
ग़ुलाब हूँ।।

ग़ुल मैं जो थी कभी 
ख़ुशहाल गुलस्तां में 
क़ब्र में ख़ामोश अब 
फ़क़ीर बनी  हूँ 
शोर-गूल से मुर्दे  
रूठ जाते हैं अक़्सर
तबस्सुम की उनकी 
मैं असबाब हूँ। 
मैं ग़मज़दा ग़मज़ा 
ग़ुलाब हूँ।।

गुलचीं की ख़िदमत औ 
गुलज़ार थी गुलस्तां 
आज़ सर-ए-आम मैं 
बाज़ार बनी  हूँ 
हैवानियत का मंज़र 
दलालों का मज़मा है 
औ,ग़ुल मैं बनी 
उनकी इक़तिसाब हूँ।  
मैं ग़मज़दा ग़मज़ा 
ग़ुलाब हूँ।।

उल्फ़तों में थी कभी 
पयाम बनी मै,
अब शाकिस्ता दिल की 
ख़ाकदान बनी हूँ 
सआदत था,थी कभी
इक्लील ख़ुदा की 
बिस्तरों की आज बनी 
मैं रिकाब हूँ।  
मैं ग़मज़दा ग़मज़ा 
ग़ुलाब हूँ।।

बुलंद थी आवाज़ जो 
तवारीख़ में अब बंद मै,
हक़ाइक़-आश्नो कि ग़ुम 
हुयी,आवाज़ बनी हूँ
उम्मीदों के बाग़ में, 
जो हिर्मान अफ़रात,
उस हिर्मानसीब तहय्युर की 
दास्ताँ बनी  हूँ 
क़ुर्बा हुये कसफो ने 
बोया जो बिज़ था 
जमहूर में सुस्त अब 
वो इन्क़िलाब हूँ। 
मैं ग़मज़दा ग़मज़ा 
ग़ुलाब हूँ।।

मस्न हूँ मांद हूँ 
महरूम हुयी साज़ हूँ 
नूरेचश्म से मलऊन ,
मबहुत हुयी लाज़ हूँ ,
दिख रहा मुझे वो 
राह-ए-दहर का मंज़र 
के ख़लवत में इनसाँ 
की  आँसू  बनी   हूँ,
मुगायरत  मुहीत  है 
दुनियाँ  में  अफ़रात 
मज़लूम    वालदैन 
की  लबोलवाब  हूँ। 
मैं ग़मज़दा ग़मज़ा 
ग़ुलाब हूँ।। 

क़ौमियत में दर्ज़ हुयी 
फ़ख्र मैं उस क़ौम की 
फ़िर क़ौम-क़ौम खेल 
में   सैद   हुयी     हूँ,
कुतरे  हो  पंख   गये  
कुतरन हो चुन   रही  
वैसा  ही  मैं     ग़ुल 
बकनूस   बनी     हूँ, 
आतिश-जने  बेफ़िक्र 
निर्दोष   सज़ायाफ्ता 
सिक्कों के बिस्तर पे 
सोयी  एहतिसाब  हूँ।  
मैं ग़मज़दा ग़मज़ा 
ग़ुलाब हूँ।।

ख़ुद की ताबिश  औ 
आफ़ताब जैसे जलता  
देख़ ग़ुल की हालत 
वो  भी  पिघलता , 
तवह्हुश में हूँ ख़ुदा 
आसारे हश्र से, गर 
यूँ लुटती रही, क़ब्र
यूँही   बढ़ता   रहा,
मैं रूह तुम्हारी हूँ 
ज़ख़्मी न करो 
दर्द फ़िर होगा तुम्हे 
वो इनतिसाब हूँ। 
मैं ग़मज़दा ग़मज़ा 
ग़ुलाब हूँ।।

जब कभी ख़याल-ए-
ऐश-ए-रफ़ता आती है 
पंखुरियों पे पड़ी ओस 
आँसू  बन जाती  है 
के  थी  मई  कभी 
सेहरा किसी की,अब 
मुतवफ़्फ़ी तश्वीरों की 
बनी  ख़िताब  हूँ। 
मैं ग़मज़दा ग़मज़ा 
ग़ुलाब हूँ।।  
  




‪#‎सर्वाधिकार‬ सुरक्षित 


अजय मिश्र 'धुनी' 

एक पहल बेटियों के अधिकार के लीये ....... 

इबनत 

अब रीत नया एक 
रिवाजी कर लो 
के इबनत को जुर्रियत 
में शामिल कर लो 

गुदड़ी हुए पुराने 
वो नक़ाब देख़ो 
लो पहलु में इन्हे,अब
तो नज़रिया बदलो 

न समझो दिन, निगल
जाती वो रात इन्हे
ये तो माहताब हैं,घर
अपना रोशन कर लो 

तबस्सुम जो थे आ-
जाया करते देख इन्हे 
पिनहां हुये चेहरों पे 
हाज़िर कर लो 

अब जहन्नुम है हुये 
देख हाल इस गुल के
जा दरगाह पै, इनके 
लिए मन्नत कर लो 

ये तो मुर्सिला पैगंबर
की, हिज़ाब घर की 
बहरायाब हुये तुम- के
कुछ सवाब कर लो

है ये इब्न का ईक 
इब्तिदा दाख़िलकर लो 
 के इबनत को जुर्रियत
 में शामिल कर लो। 




‪#‎सर्वाधिकार‬ सुरक्षित 


अजय मिश्र 'धुनी' 

जिन्दगी के अनुभव से …… 


निरांजली………… 

सत्रह वर्ष हो गए मेरे शादी को परन्तु आज सात वर्षो से मैं अपनी जिंदगी की गाड़ी अकेले ही हाँक रही हूँ। बीस की थी तभी पापा ने समीर के साथ विवाह बंधन में बाँध कर घर से दूर कर दिया था। फिर तीस की हुई तो समीर ने अपने जिंदगी से। अभी मैं अपने पापा के साथ अपने मायका में ही रहती हूँ। खुश हूँ और अब कोई मानसिक तनाव मुझे परेशां नहीं करते। पहले कुछ लोग पति से अलग रहने का कारण पूछते तो बता नहीं पाती थी।पर आज, सच सबके सामने है। 
                                                  शादी के बाद समीर मुझे कलकत्ता ले आया था। हमने दो साल की फैमिली प्लानिंग की और साथ में यह भी फैसला लिया की दो साल के बाद हममे से कोई बहाना भी  नहीं करेगा।समीर के साथ  बिताये हुये वो दो साल मैं कभी नहीं भूल सकती। ऐसा लगता था की समीर धरती की सारी खुशियों को इकट्ठा कर मेरी झोली में डालना चाहता हो। न शक न शर्त, न शिकायत न शिकवा वह दो साल हमने भरपूर जिया। पर क्या पता था की की बिताई हुयी वह खुशी, वो चिराग होगी जिसके निचे का अन्धकार मेरे आने वाले समय को अपने आगोश में लेकर; मेरे इस जीवन को ही अन्धकार का पर्याय बना देगी। 
दो साल बीत चुके थे। …  और एक रात मैंने ही समीर से कहा की मैं आपको अब एक सुन्दर बच्चे के पिता के रूप में देखना चाहतीं हूँ। मेरे इस चाहत को समीर का पूरा समर्थन मिला था। परन्तु कभी-कभी मैं अपने आप को कोसती हूँ  कि काश मैंने उस वक्त अपने अरमां को काबू में रखा होता तो खुशियों से भरे कुछ और पल, मेरे भीतर अपना बसेरा बसाये होते। दो साल और बीत चुके थे। लेकिन एक बच्चे की हमारी लालसा, अभी स्वप्न भर ही थे। एक दिन समीर कुछ उदास सा दिखा। मुझे कारण समझते देर न लगी। मैंने समीर को समझाया कि ''किसी -किसी के साथ देर सबेर हो जाती है।  हो सकता है मैं भी उन्ही में से एक होऊं। उदास होने से क्या होगा, कोशिश तो कर ही रहें है न हम दोनों।' 'ज्यादा चिंता मत किया करो देर होगा दुरुस्त होगा।' समीर को शायद मेरी बातों से कुछ शांति मिली उसने हामी भरी और बेडरूम में चला गया।         
  इन चार सालो में ऐसा पहली बार हुआ था की समीर ने उसदिन  भरमन मुझसे बात नहीं किया।दुसरे दिन समीर ऑफिस से जल्दी आ गये और मुझसे कहा की- निरा आज हम दोनों बाहर जाने वाले हैं, तुम जल्दी से तैयार हो जाओ।मैंने सुना और  मुझमे जैसे पंख लग गये,मैं फुदकने लगी थी नवजात पक्षियों के जैसे और ख़याली पुलाव पकने लगे थे मन में। पर कुछ समय के बाद रेडी होकर निचे गयी तब पंख और पुलाव दोनों ख़ाक हो गए जब उन्होंने बताया की डॉक्टर के पास जा रहें हैं।  मैंने पुछा कि हम डॉक्टर के पास क्यों जा रहें हैं तो चिढ़ते हुए कहा की अब मैं इस भूल-भुलैया को ख़त्म कर देना चाहता हूँ। समीर को इतना बेचैन ,परेशान मैं पहली बार देख रही थी। मैंने कोई बहस किये बिना  साथ जाना ही उचित समझा क्योंकि बिना कारण ,बिना प्रमाण की बहस किसी भी रिस्ते को चकनाचूर करने के लिए  काफी होतें है और ऐसा मैं हरगिज नहीं चाहती। हम दोनों ने अपनी जाँच करायी और घर आगये। दो दिन बाद समीर रिपोर्ट लेकर आया और सीधे मेरे चेहरे पर दे मारा। इस प्रकार के व्यवहार से कुछ देर बुत बने मैं समीर को निहारती रही और फिर आँसू पोछकर रिपोर्ट पड़ने लगी। कमी मुझमे ही थी। रिपोर्ट में साफ़-साफ यह लिखा था की मैं कभी किसी बच्चे को जन्म नहीं दे सकती। उस वक्त मुझपर क्या बीत रही थी मैं बयां नहीं कर सकती। बस मुझे सहारे की जरुरत थी जो मुझे समीर ही दे सकता था। मैं भागकर गयी और समीर से लिपट कर रोने लगी। पर समीर मुझे अपने से अलग कर बैडरूम में चला गया। इस घटना ने मुझे भीतर तक झझोर दिया। मैं बिलख पड़ी पर समीर नहीं आया मेरी आंसू पोछने।मुझमे भय व्याप्त होने लगा था की समीर की ये बेरूखी ,हमारे रिस्तों में कंही दरार न कर दे।इसलिए मैं खुद ही समीर के पास गई। उस वक्त मैंने उसे बहुत समझाया कि -क्या हुआ जो  मैं किसी बच्चे को जन्म नहीं दे सकती हूँ, माँ तो बन ही सकती हूँ और तुम पिता। हम किसी अनाथ को अपना लेंगे। उन्हें भी तो माँ -बाप चाहिए ही न जैसे हमें बच्चा। पर समीर खामोश सुनता रहा।            
                       समीर की ख़ामोशी सालो तक जारी रही। फिर धीरे-धीरे हमारे बीच झड़प बढ़ने लगी। उस समय मैंने लाखों बार ये प्रयास किया की हमदोनो के बीच की दरार अपने प्रेम से भर दूँ पर असफल रही। हमारे बीच दूरियां बढ़ने लगी थी.…।  और एक दिन समीर ने साफ-साफ कह दिया की वो दूसरी शादी करना चाहता है। मुझे अपने साथ नहीं रखना चाहता है। मैं कई दिनों तक रोती रही,तड़पती रही पर समीर पर जैसे दूसरी शादी का भुत सवार था। … और आखिर, एक दिन समीर ने मेरी सौत को लाकर मेरे सामने खड़ा कर दिया। फिर उसने मुझसे कहा कि 'निरा आओ ,देखो ये है अंजलि है न सुन्दर।उसके बेशर्मी से भरे वो शब्द हज़ारो कांटे बनकर मुझे चुभे।मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या ये वही समीर है जो मुझपर चाँद ,तारे निछावर करने की बातें किया करता था। उस वखत मैं ये सोचने पर मजबूर हो गयी थी की इस परिस्थिति के लिए मैं किसे दोसी ठहराऊँ, अपनी किस्मत को की पापा के द्वारा हड़बड़ी में लिए उस फैसले को।फिर सोचा की पापा की इसमें क्या गलती है। गलती तो भगवान की है ,इनसानों में सारी क़ाबलियत भरी उन्होंने , बस मन और दिल कोई पढ़ पाये ऐसा तकनीक डालना भूल गए वरना आज मुझे ये दिन, न देखना पड़ता।फिर दुसरे ही दिन समीर ने मुझसे पेपर पर सिग्नेचर लेकर घर से जाने को कह दिया। उस वक्त मेरे पास दो रास्ते थे।पहला , या तो मैं अपने अधिकारों के लिए लड़ती या चुपचाप वंहा से चली जाती। मैंने दूसरा वाला रास्ता चुना क्योंकि जब पति पर ही अधिकार न रहा तो उसके रुपये पैसे लेकर एक स्त्री कौन सा सपनो का महल खड़ा कर लेगी। समीर से अलग होते समय मेरे मन में एक विचार जन्म ले रही थी कि -क्या ? विवाह बिस्तर बच्चे का ही दूसरा नाम है। क्या ? वो विस्वास ,वो प्रेम का बंधन और आपसी समझौते स्त्री में उत्पन्न एक छोटी सी कमी के आगे और छोटे हो जातें है। 'बहरहाल कुछ भी हो पर मेरे कोख से बच्चा न होना हमारे अलगाव का कारण नहीं था'              
                                                               मेरी यह भ्रम उस वक्त टूटी जब उनसे अलग हुए पांच साल हो गए थे। उस दिन दोपहर का समय था। मै पापा के लिए लंच बना रही थी। तभी डोरबेल बजा। पापा ने दरवाजा खोला तो सामने एक लड़की रोती ,बिलखती मुझे ढूंढ रही थी। पापा ने मुझे बुलाया। मैं आई और देखा तो उसका चेहरा मुझे जाना पहचाना सा प्रतीत हो रहा था। फिर ध्यान आया की ये तो अंजली है। मैंने उसे बिठा कर,शांत कराते हुए पानी का ग्लास बढ़ाया,फिर चाय बनायीं और फिर उसकी आपबीती सुनी।उसने बताया की वो भी कभी माँ नहीं बन सकती इसलिए समीर ने उसे भी छोड़ दिया। मैंने उसके रिपोर्ट देखे उसमे भी वही बाते लिखी थी। पता नहीं क्यों और कहाँ से आया पर मुझे कुछ डाऊट सा हुआ। फिर मै ने दुसरे क्लिनिक में अपनी और अंजली की जांच करायी। … और जब रिपोर्ट आई तो सारा खेल साफ़ हो गया। मुझमे सच में कमी थी परन्तु अंजलि में ऐसी कोई कमी नहीं थी। समीर ने वो रिपोर्ट फर्जी बनवाया था, डॉक्टर को पैसे देकर। चूँकि मरे साथ तो उसे बहाना मिल गया था पर अंजली को अलग करने का उसके पास कोई बहाना नहीं था। इसलिए उसने ये नाटक रचाया था।फिर हमने पुलिस में कम्प्लेन किया। डॉक्टर तो पकड़ा गया पर समीर की तलाश अभी भी जारी है। आज समीर जैसों पर मुझे तरस आती है। फिर भी अगर समीर ने मुझे अपनाते हुये ,बच्चे के खातिर दूसरी शादी करना चाहता तो शायद मैं मान भी जाती। हाँ ,ये सच है की थोड़ा दुख होता पर ये भी सच है की आपसी समझौते ही रिस्तों को बचाने का एकमात्र विकल्प हैं। काश उसने मुझसे समझौता किया होता। काश ,उसने कहा होता कि निरा और अंजली दोनों मेरे दिल के टुकड़े हैं। पर वो क्यों कहता ? उसे तो शरीर की भूख थी बच्चे की नहीं।   






‪#‎सर्वाधिकार‬ सुरक्षित 


                                                             अजय मिश्र 'धुनी'